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Home»उत्तराखंड»नहीं रहे पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी: उत्तराखंड की राजनीति का एक एक युग समाप्त 
उत्तराखंड देहरादून राज्य समाचार

नहीं रहे पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी: उत्तराखंड की राजनीति का एक एक युग समाप्त 

Devbhumi NewsBy Devbhumi NewsMay 19, 2026No Comments6 Mins Read
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लंबी बीमारी के बाद 91 की उम्र में हुआ निधन

मेजर जनरल (रि.) भुवन चंद्र खण्डूरी, एवीएसएम का जीवन भारतीय सैनिक परंपरा, राष्ट्रभक्ति, अनुशासन और जनसेवा की एक प्रेरणादायी गाथा रहा। 1 अक्टूबर 1934 को देहरादून में जन्मे भुवन चंद्र खण्डूरी ऐसे व्यक्तित्व थे जिन्होंने अपने जीवन के प्रत्येक चरण में कर्तव्य और ईमानदारी को सर्वोच्च स्थान दिया। उनके पिता स्वर्गीय जय बल्लभ खण्डूरी और माता स्वर्गीय दुर्गा देवी खण्डूरी ने उन्हें ऐसे संस्कार दिए, जिनकी छाप उनके पूरे सार्वजनिक जीवन में स्पष्ट दिखाई दी।

प्रारम्भिक शिक्षा के बाद उन्होंने 1951 से 1953 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय से विज्ञान की पढ़ाई की। युवावस्था में ही उन्होंने राष्ट्रसेवा को अपना जीवन लक्ष्य बनाया और सैन्य जीवन की ओर अग्रसर हुए। 1954 में उन्होंने भारतीय सेना की कॉर्प्स ऑफ इंजीनियर्स में कमीशन प्राप्त किया और इसी के साथ राष्ट्रसेवा की उनकी लंबी और गौरवशाली यात्रा आरम्भ हुई। आगे चलकर उन्होंने 1957 से 1959 तक पुणे स्थित कॉलेज ऑफ मिलिट्री इंजीनियरिंग में सिविल इंजीनियरिंग का अध्ययन किया। सैन्य नेतृत्व और रणनीतिक क्षमता को सुदृढ़ करने के लिए उन्होंने 1969 में डिफेन्स सर्विसेज स्टाफ कॉलेज, वेलिंगटन तथा इंग्लैंड के रिज़र्व स्टाफ कॉलेज में प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसके अतिरिक्त 1973–74 में इंस्टिट्यूट ऑफ डिफेन्स मैनेजमेंट, सिकंदराबाद और 1976 में नई दिल्ली स्थित इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में उच्च प्रशिक्षण लेकर उन्होंने प्रशासन और नेतृत्व के क्षेत्र में अपनी दक्षता को और मजबूत किया।

भारतीय सेना में लगभग छत्तीस वर्षों की सेवा के दौरान खण्डूरी जी ने देश की रक्षा के लिए तीन ऐतिहासिक युद्धों में योगदान दिया। वे 1962 के भारत–चीन युद्ध, 1965 के भारत–पाक युद्ध तथा 1971 के भारत–पाक युद्ध के सहभागी रहे। इन युद्धों ने उनके व्यक्तित्व को और अधिक दृढ़, अनुशासित और राष्ट्रनिष्ठ बनाया। विशेष रूप से 1971 के युद्ध में जम्मू-कश्मीर के सांबा सेक्टर में इंजीनियर रेजिमेंट के कमांडर के रूप में उन्होंने महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई और युद्धकालीन परिस्थितियों में असाधारण नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया।

सेना में रहते हुए उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। वे आर्मी मुख्यालय, नई दिल्ली में डायरेक्टर ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज़ रहे, मेरठ में इंजीनियर ब्रिगेड के कमांडर बने, पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी क्षेत्र में चीफ इंजीनियर की जिम्मेदारी निभाई तथा सेना मुख्यालय में डिप्टी और एडिशनल मिलिट्री सेक्रेटरी एवं इंजीनियर-इन-चीफ शाखा में अतिरिक्त महानिदेशक जैसे महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। उनकी विशिष्ट और समर्पित सेवाओं के सम्मान में भारत सरकार ने 26 जनवरी 1982 को उन्हें अति विशिष्ट सेवा मेडल (AVSM) से सम्मानित किया। लगभग साढ़े तीन दशकों की गौरवपूर्ण सेवा के पश्चात वे 1990–91 में मेजर जनरल के पद से सेवानिवृत्त हुए।

सेना से अवकाश लेने के बाद भी उनका जीवन राष्ट्रसेवा से दूर नहीं हुआ। उन्होंने सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया और 1991 में पहली बार गढ़वाल लोकसभा क्षेत्र से सांसद निर्वाचित हुए। जनता ने उनके नेतृत्व और ईमानदारी पर निरंतर विश्वास जताया और वे 1998, 1999, 2004 तथा 2014 में पुनः लोकसभा सदस्य चुने गए। संसद में रहते हुए उन्होंने वित्त, रक्षा, गृह, पेट्रोलियम तथा लोक लेखा समितियों सहित अनेक संसदीय समितियों में सक्रिय भूमिका निभाई। अगस्त 2004 से मार्च 2007 तक वे संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति के अध्यक्ष भी रहे।

उनकी प्रशासनिक दक्षता और दूरदर्शिता को देखते हुए 7 नवम्बर 2000 को उन्हें भारत सरकार में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाया गया। 23 मई 2003 तक इस दायित्व को निभाने के बाद 24 मई 2003 को वे केंद्रीय मंत्रिमंडल में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री बने और 21 मई 2004 तक इस पद पर रहे। 12 जुलाई 2003 से 8 सितम्बर 2003 तक उन्होंने शहरी विकास मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार भी संभाला।

केंद्रीय मंत्री के रूप में उनका योगदान भारत के आधुनिक बुनियादी ढांचे के निर्माण से जुड़ा रहा। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में प्रारम्भ हुई राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना और गोल्डन क्वाड्रिलेटरल को गति देने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता को जोड़ने वाली यह परियोजना भारत के आर्थिक और औद्योगिक विकास की रीढ़ सिद्ध हुई और देश में सड़क संपर्क की नई क्रांति लेकर आई। इस कार्य ने उन्हें दूरदर्शी और परिणामोन्मुख प्रशासक के रूप में स्थापित किया।

उत्तराखंड राज्य की राजनीति में उनका योगदान भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। 8 मार्च 2007 को उन्होंने पहली बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और 27 जून 2009 तक इस दायित्व का निर्वहन किया। उनके नेतृत्व में प्रशासनिक अनुशासन, वित्तीय सुधार और पारदर्शिता पर विशेष बल दिया गया। वर्ष 2008 में इंडिया टुडे द्वारा उन्हें देश के सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री के रूप में सम्मानित किया गया। उनके कार्यकाल में उत्तराखंड के वित्तीय प्रबंधन की प्रशंसा राष्ट्रीय स्तर पर हुई और 13वें वित्त आयोग द्वारा राज्य को विशेष सराहना मिली।

11 सितम्बर 2011 को वे दूसरी बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने और 13 मार्च 2012 तक इस पद पर रहे। उनके दूसरे कार्यकाल की सबसे बड़ी पहचान भ्रष्टाचार के विरुद्ध सख्त रुख और मजबूत लोकायुक्त कानून रही। इस कानून को उस समय देश के सबसे प्रभावशाली भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों में गिना गया। साथ ही नागरिक चार्टर, स्थानांतरण नीति और प्रशासनिक सुधारों को भी उन्होंने प्राथमिकता दी।

राजनीति के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। 1990 से 1993 तक वे पर्वतीय संस्कृति परिषद, देहरादून के संरक्षक रहे। 1992 से 2000 तक उन्होंने पूर्व सैनिक सेवा परिषद उत्तर प्रदेश के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। वे अपने दादा द्वारा स्थापित चन्द्रवल्लभ ट्रस्ट से जुड़े रहे और उत्तराखंड आर्चरी एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रहे। समाज सेवा और मानवीय मूल्यों के प्रति योगदान के लिए उन्हें 10 जनवरी 2013 को मदर टेरेसा इंटरनेशनल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।

अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में उन्होंने अनेक देशों—फ्रांस, जर्मनी, जापान, स्विट्ज़रलैंड, अमेरिका, ब्रिटेन और वियतनाम सहित कई देशों—का दौरा किया, परंतु उनकी पहचान सदैव एक सरल, स्पष्टवादी और सिद्धांतनिष्ठ जननेता की रही। उनके व्यक्तित्व में सैनिक अनुशासन और जनसेवा का अद्भुत संतुलन दिखाई देता था। वे मानते थे कि सत्ता सेवा का माध्यम है, विशेषाधिकार का नहीं।

1 अक्टूबर 1934 को प्रारम्भ हुई यह प्रेरक यात्रा सेना के रणक्षेत्रों, संसद के विमर्शों और उत्तराखंड की जनसेवा से होकर गुज़री। सैनिक, सांसद, केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री और समाजसेवी—हर भूमिका में भुवन चंद्र खण्डूरी ने राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा। उनका जीवन केवल पदों और उपलब्धियों का विवरण नहीं, बल्कि ईमानदारी, अनुशासन और समर्पण की ऐसी विरासत है जो आने वाली पीढ़ियों को लंबे समय तक प्रेरित करती रहेगी।

 

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